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सिकंदराबाद में जो खोज रोनाल्ड रॉस ने की वह कड़ी मेहनत जुनून की बेमिसाल गाथा है

आज से ठीक 117 साल पहले भारत में जन्मे और तत्कालीन इंडियन मेडिकल सर्विस के अधिकारी डॉ. रोनाल्ड रॉस ने मच्छर की आंत में मलेरिया के रोगाणु का पता लगाकर यह तथ्य स्थापित किया था कि मच्छर मलेरिया का वाहक है और मच्छरों पर काबू पाकर इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। इस खोज ने कई रोगों के इलाज की दिशा में नए युग की शुरुआत की। रॉस को इस खोज के लिए
World Mosquito day
1902 में नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया। सिकंदराबाद की भीषण गर्मी, अत्यधिक उमस और खुद मलेरिया के शिकार होते हुए भी उन्होंने एक हजार मच्छरों का डिसेक्शन किया। यह काम कितना कठिन था, यह खोज के दिन व्यक्त उनके शब्दों से पता चलता है 
रोनाल्ड रॉस का जन्म 13 मई 1857 को अल्मोड़ा में हुआ था। देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने के सिर्फ तीन दिन बाद। वे अंग्रेजी राज की भारतीय सेना के स्कॉटिश अफसर सर कैम्पबेल रॉस की दस संतानों में सबसे बड़े थे। युवा रोनाल्ड की रुचि कवि या लेखक बनने में थी। स्कूली पढ़ाई में उन्हें गणित की समस्याएं हल करने में मजा आता था। तब इंडियन मेडिकल सर्विस (आईएमएस) के अफसरों को बहुत अच्छी तनख्वाह मिलती थी और तरक्की के बहुत मौके थे, इसलिए उनके पिता उन्हें इंडियन मेडिकल सर्विस का अफसर बनते देखना चाहते थे। इंग्लैंड में स्कूली शिक्षा के बाद पिता के दबाव में उन्होंने लंदन के सेंट बर्थेलोम्यू मेडिकल स्कूल में प्रवेश ले लिया।

मेडिकल शिक्षा पूरी होने के बाद वे अनिच्छापूर्वक आईएमएस की प्रवेश परीक्षा में बैठे और नाकाम हुए। पिता के दबाव में अगले साल वे फिर परीक्षा में बैठे और 24 सफल छात्रों में 17वंक नंबर पर आए। आर्मी मेडिकल स्कूल में चार माह के प्रशिक्षण के बाद वे आईएमएस में दाखिल हो गए और पिता का सपना पूरा हुआ। उन्हें कलकत्ता या बॉम्बे के बजाय सबसे कम प्रतिष्ठित मद्रास प्रेसीडेंसी में काम करने का मौका मिला। वहां उनका ज्यादातर काम मलेरिया पीड़ित सैनिकों का इलाज करना था। क्विनाइन से रोगी ठीक तो हो जाते, लेकिन मलेरिया इतनी तेजी से फैलता कि कई रोगियों को इलाज नहीं मिल पाता और वे मर जाते।

भारत में सात साल काम करने के बाद वे बोर हो गए और 1888 में इंग्लैंड लौट गए। हालांकि, वहां उन्होंने पाया कि उनके साहित्य के पाठक परिजनों मित्रों से आगे नहीं बढ़ रहे हैं। उनकी आंखें खुली और उन्होंने लंदन में 'पब्लिक हैल्थ' में डिप्लोमा कर लिया। अब वे प्रयोगशाला की तकनीकों और माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल करने में माहिर हो गए थे। वे 1889 के आखिर में फिर भारत लौटे और बेंगलुरू के छोटे से सैन्य अस्पताल में काम करने लगे। अब वे मलेरिया पर थ्योरी बनाने में लग गए। बुखार का कोई भी रोगी आता तो वे उसकी उंगली में सुई चुभोकर खून का सैंपल लेते और घंटों माइक्रोस्कोप के नीचे रखकर अध्ययन करते। 1894 में वे लंदन आए और तब के ख्यात डॉक्टर पेट्रिक मैन्सन से मिले तो उन्होंेने रॉस से कहा, 'मुझे लगता है कि मच्छर मलेरिया के रोगाणु फैलाते हैं।' इन शब्दों ने रॉस के जीवन को बदल दिया। उन्हें एक उद्‌देश्य मिल गया।

जहाज से भारत लौटते समय वे यात्रियों चालक दल के सदस्यों को सुई चुभोकर खून के सैंपल लेते और उसकी जांच करते। जहाज जिस भी बंदरगाह पर रुकता, वे उस शहर के अस्पताल से मलेरिया के रोगियों के खून के सैंपल मांगते। अपने सैन्य अस्पताल में पहुंचकर उन पर काम का जुनून ही सवार हो गया। रोगी उन्हें देखते ही भागने लगते, क्योंकि वे बार-बार सुई चुभोने से परेशान हो गए थे। साथी डॉक्टर उन्हें मलेरिया के मामलों से दूर ही रखते। एक सुई चुभोने का वे 1 रुपया देने लगे, जो उस जमाने में बहुत बड़ी रकम थी। वे मच्छर पकड़ते। रोगियों को मच्छरदानी में सुलाकर मच्छर छोड़ देते ताकि उनके काटने से उन्हें अध्ययन का मौका मिले। सैकड़ों मच्छरों का डिसेक्शन कर लिया पर कोई परिणाम नहीं निकला। वे निराश होकर रिसर्च छोड़ने पर उतारू हो गए। तब मैन्सन ने पत्र लिखकर उन्हें काम जारी रखने को प्रेरित किया।

फिर रॉस ने मच्छरों को अब्दुल कादिर नाम के रोगी को काटने दिया। इन मच्छरों को पानी से भरी बोतल में तब तक बंद रखा जब तक वे मर गए और फिर बहुत बड़ी रकम देने का वादा कर अपने नौकर दो अन्य को वह पानी पीने को कहा। उनके नौकर को बुखार आया पर वह तन दिन में ठीक हो गया। खून में मलेरिया का रोगाणु भी नहीं मिला। वे इतने हताश हो गए कि फिर कविताएं लिखने लगे। 1897 में वे उटी के नजदीक सिगुर घाट गए। वहां उन्हें मलेरिया हो गया। वहां कमरे में पड़े-पड़े उन्हें दीवार पर अजीब-सा मच्छर दिखा, िजसे उन्होंने चितकबरे पंखों वाला मच्छर (मादा एनाफिलिस) कहा। अचानक उन्हें लगा कि वे मच्छर की गलत प्रजाति पर प्रयोग कर रहे हैं। वे जून 1897 में सिकंदराबाद लौटे और उन्हें हैजा हो गया। ठीक हुए तो उन्होंने मच्छर की विभिन्न प्रजातियों का अध्ययन शुरू किया। उनका नौकर बोतल में मच्छर पकड़-पकड़कर लाता और वे डिसेक्शन करते। हर कोशिका का परीक्षण करते। रॉस ने लिखा है, 'अगस्त में मौसम बहुत गर्म था। शुरू में तो मैं बड़े मजे से काम करता पर नाकामी के बाद नाकामी देखकर मैं हताश हो चला था। माइक्रोस्कोप में आंखें गड़ाने से वे इतनी थक जातीं कि भरी दोपहर में घर लौटते वक्त मुझे कुछ दिखाई नहीं देता। उस दिन बेगमपेट के अस्पताल के मेरे ऑफिस में बादलों से ढके आसमान से हल्की सी रोशनी रही थी। पसीना बह रहा था पर नौकर को पंखा करने को नहीं कह सकता था, माइक्रोस्कोप के नीचे रखे मच्छर हवा से उड़ जाते। उनके भाई-बंधु चारों तरफ से मुझे काट रहे थे। महीनों से पसीना गिरने से माइक्रोस्कोप के स्क्रू में जंग लग गया था। इसका आखिरी आई-पीस क्रेक हो गया था। 15 अगस्त को मेरा नौकर जो बोतल लेकर आया उसमें चितकबरे पंखों वाले कई मच्छर थे। मेरी तो बांछें खिल गईं। मलेरिया के रोगी हुसैन खान को 1 आना देकर मच्छरों से कटवाया गया। उसे कुल 10 आने दिए गए। 17 अगस्त को मैंने दो मच्छरों का डिसेक्शन किया। कुछ नहीं मिला। 19 अगस्त को मैंने एक मच्छर का डिसेक्शन किया तो उसमें 10 माइक्रॉन की कोशिका थी, जिसमें कुछ रचनाएं थीं पर कुछ स्पष्ट नहीं हुआ। 20 अगस्त को मैं सुबह 7 बजे ही अस्पताल पहुंच गया। रोगियों को देखा। जरूरी पत्र देखें। जल्दी-जल्दी नाश्ता किया। हुसैन खान से मिला अब दो ही मच्छर बचे थे।

दोपहर बाद 1 बजे मैंने मच्छर का डिसेक्शन शुरू किया। माइक्रॉन बाय माइक्रॉन कोशिकाओं का अध्ययन चल रहा था। अचानक मच्छर के पेट की दीवार पर 12 माइक्रॉन की एकदम गोल रचना नजर आई। थोड़ा आगे देखा तो एक और ऐसी रचना थी। फोकस बदला तो हर रचना में कुछ काला दानेदार-सा भरा पाया। चाय पीकर सो गया। उठा तो विचार आया कि यदि कोशिका में मलेरिया के रोगाणु हैं तो सुबह उन्हें फूल जाना चाहिए।
रात बेचैनी में गुजरी। सुबह आखिरी मच्छर का डिसेक्शन किया और उसमें पेट की कोशिकाएं फूली हुई थीं। ये मलेरिया के रोगाणु (प्लास्मोडियम वायवैक्स) थे।' 20 अगस्त का दिन इसीलिए मलेरिया दिवस के रूप में मनाते हैं। 4 सितंबर को वे बेंगलुरू में परिवार के पास लौटे और अपना पेपर लिखा, जो 18 दिसंबर 1897 को ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ।
 
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