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जब ब्राह्मणों का तेज भौतिकता में विलीन हो रहा था, समाज में आंतरिक श्रेष्ठता की परख न होकर बाह्य शक्ति को महत्व मिल रहा था। क्षात्र-धर्म की रक्षा करने वाले तलवारों को म्यान में डाल नर्तकियों के नूपुरों के स्वर में मग्न थे, यह सब देख कर एक तपस्वी का मन व्यथित हो उठा। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक समग्र मानवता अभय होकर धर्मयुक्त आचरण नहीं करेगी उनका संघर्ष चलता रहेगा। पाप रहित धरती के सृजन के लिए अपना जीवन अर्पित करने वाले महायोगी थे भगवान परशुराम। वे महर्षि जमदग्नि और साध्वी रेणुका के पांच पुत्रों में सबसे छोटे थे।
एक बार उनके बड़े भाई वसु ने उनसे कहा कि तुम शस्त्र ज्ञान में अधिक रुचि लेते हो, जबकि ब्राह्मण होने के नाते हमारा अभीष्ट केवल शास्त्रों का ज्ञानार्जन है। इस पर बालक ने कहा, ‘पूज्यनीय भ्राता! हमें शास्त्रों की गंभीर विवेचना और अध्ययन का कार्य करना चाहिए, लेकिन तभी संभव है, जब संपूर्ण वातावरण धर्मानुकूल हो और लोग ब्राह्मण से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखें। वर्तमान समय में ऐसा नहीं है। ऐसे में मेरा ब्राह्मणत्व मुझसे कह रहा है कि मैं व्यापक परिवर्तन की गर्जना करूं। यह समय वैदिक मंत्रों के जाप का समय नहीं है, अपितु उन्हंे एक शक्ति का आकार देकर समाज को भय मुक्त करने का है।’ यह कहकर बालक राम आश्रम से निकल गए।
Why did Lord Parshuram take the weapons in hindi khaniya bhgwan parshuram khaniyaकैलाश पर्वत पर जाकर उन्होंने भगवान शंकर की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें अमोघ अस्त्र परशु भेंट किया। यह दिव्य अस्त्र अत्यंत तीक्ष्ण और महातेज से युक्त था। भगवान शंकर ने यह भी कहा कि आज से तुम परशुराम के नाम से जाने जाओगे। लेकिन इतना अवश्य ध्यान रखना कि जहां संपूर्ण मानवता का हित हो या किसी आदर्श की स्थापना करनी हो, वहीं इस अस्त्र का प्रयोग करना। परशुराम ने जीवन भर इसका पालन किया। वे अन्याय के विरोधी थे, लेकिन विनम्रता के उपासक। सीता के स्वयंवर में अपने इष्ट शिव का धनुष तोड़ने को लेकर वो राम से क्रोधित भी हुए थे। लेकिन बाद में राम को विष्णु का अवतार जान कर उनसे क्षमा भी मांग ली।
एक बार नरेश सहस्त्रार्जुन महर्षि जमदग्नि के आश्रम में आकर जबर्दस्ती उनकी गाय ले गए। भगवान परशुराम ने आश्रम में आकर देखा कि पिता की आंखों में आंसू हैं। माता से घटना के बारे में सुनकर वह क्रोधित हो गए। उसी समय परशुराम अपने आयुधों को लेकर सहस्त्रार्जुन से युद्ध करने के लिए चल दिए। माता ने रोकना चाहा तो उन्होंने कहा, ‘माताश्री! जब समाज दिशाहीन हो जाए तो शस्त्र उठाने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए, परशुराम ने नरेश का वध कर गाय को मुक्त कराया।’ पिता को यह बुरा लगा कि उनके पुत्र ने हिंसा का कार्य किया है। परशुराम ने उन्हें भी समझाया कि जब शासक सामान्य जनों और ज्ञानियों पर अत्याचार करने लगे तो क्षमा जैसे भावों का कोई अर्थ नहीं रहता। ऐसी स्थिति में अत्याचारियों के खिलाफ शस्त्र उठाना अनिवार्य व धर्म-सम्मत होता है। स्वामी चक्रपाणि
भगवान परशुराम शास्त्र के साथ शस्त्र के भी उपासक थे। राजाओं ने प्रजा पर जुल्म किए तो उन्हें सजा देने के लिए तपस्वी ने अपना फरसा उठा लिया। पृथ्वी पर धर्मपूर्णआचरण की स्थापना के लिए उन्होंने शस्त्र उठाने से संकोच नहीं किया।
 
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