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सफलता पाने के लिए सोच-समझकर खतरे उठाने से फायदे ही होते हैं। इसका मतलब बेवकूफी भरा जुआ खेलना या गैरजिम्मेदारी बरतना कतई नहीं होता। कई बार लोग गैरजिम्मेदारीपूर्ण और ऊटपटांग कामों को करना भी खतरे उठाना मान लेते हैं। ऐसा करने से जब उन्हें इसके बुरे नतीजे मिलते हैं तो वे अपनी किस्मत को दोष देने लगते हैं, जबकि दोष पूरी तरह से उनकी सोच का होता है।

खतरा उठाना अलग-अलग इंसान के लिए अलग-अलग हो सकता है और यह उसकी ट्रेनिंग का परिणाम भी हो सकता है। पहाड़ पर चढ़ना किसी प्रशिक्षित व्यक्ति और किसी नए सीखने वाले दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है, लेकिन प्रशिक्षित व्यक्ति के लिए इसे गैरजिम्मेदारी भरा खतरा नहीं माना जा सकता। जिम्मेदार ढंग से खतरे उठाने के लिए ज्ञान, प्रशिक्षण, ध्यानपूर्वक अध्ययन, आत्मविश्वास और क्षमता की जरूरत होती है।
खतरा सामने होने पर ये चीजें हमको उसका सामना करने की हिम्मत देती हैं। जो व्यक्ति खतरा नहीं उठाता है, वह कोई गलती भी नहीं करता है। लेकिन कोशिश न करना, कोशिश करके असफल होने से भी बड़ी गलती है।
कई लोगों में फैसला न ले पाने की आदत बन जाती है और यह छुआछूत की बीमारी की तरह फैलती है। ऐसे लोग फैसला न ले पाने के कारण कई अवसरों से हाथ धो बैठते हैं। खतरे उठाइए, पर जुआ मत खेलिए। खतरे उठाने वाले अपनी आंखें खुली करके आगे बढ़ते हैं, जबकि जुआ खेलने वाले अंधेरे में तीर चलाते हैं।
इस संबंध में एक कथा का जिक्र यहां प्रासंगिक है। एक बार किसी ने एक किसान से पूछा, ‘क्या तुमने इस मौसम में फसल बोई है?’ किसान ने जवाब दिया, ‘नहीं, मुझे बारिश नहीं होने का अंदेशा था।’ उस आदमी ने पूछा, ‘क्या तुमने मक्के की फसल बोई है?’ किसान ने जवाब दिया, ‘नहीं, मुझे डर था कि कीड़े-मकोड़े खा लेंगे।’ तब उस आदमी ने पूछा, ‘आखिरकार तुमने बोया क्या है?’ किसान ने जवाब दिया, ‘कुछ नहीं, मैं कोई खतरा उठाना ही नहीं चाहता था।’

नि:संदेह ऐसे लोग कभी भी आगे नहीं बढ़ते जो आंखें खोलकर भी आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं। इस तरह से खतरा मोल लेना निश्चय ही आगे बढ़ने में मददगार होता है। सोच-समझ के साथ कोई रिस्क लेना तरक्की की सीढ़ी है। 
 
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