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कंपन होना, घबराहट होना, पसीना आना, मांसपेशियों में जकड़न आदि देखने को मिलती हैं। इस स्थिति में एक समय व्यक्ति बहुत घबराया या नर्वस रहता है एवं दूसरे समय में वह चीखने लगता है। ऐसे लोग किसी कार्य पर ध्यान एकाग्र नहीं कर पाते और निर्णय लेने की क्षमता भी बहुत कम हो जाती है। व्यक्ति लगातार परेशान व चिड़चिड़ा रहने लगता है। किसी गंभीर बीमारी की आशंका से ग्रस्त रहने लगता है। नींद नहीं आती है। भूख कम हो जाती है।
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एनोरेक्सिया नर्वोसाःAnorexia nervosa) एनोरेक्सिया नर्वोसा नामक समस्या मुख्य रूप से लड़कियों में युवावस्था में पाई जाती है। इस समस्या से ग्रस्त व्यक्ति बहुत पतला बना रहना चाहता है। वह हर हाल में वजन कम करना चाहता है। ऐसे व्यक्ति वजन कम करने के लिए उल्टी करने के साथ-साथ पेट साफ करने की दवा भी लेने लगते हैं। कभी-कभी ठीक प्रकार से खाने के बाद आत्मग्लानि महसूस करता है कि मैंने क्यों खाया और जो खाया है उसे उलट देता है। यह सबसे गंभीर स्थिति होती है।
ऐसे व्यक्ति को अपने शारीरिक स्वास्थ्य की गिरती स्थिति से कोई लेना-देना नहीं होता है। वह इलाज भी नहीं लेना चाहता है। ऐसे व्यक्ति में खाने की स्थिति में सुधार के साथ साइकोथेरेपी एवं मानसिक रोग विशेषज्ञ से उपचार आवश्यक होता है।
अवसादः(Dipression) डिप्रेशन यानी अवसाद महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले थोड़ा ज्यादा पाया जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति आमतौर पर चुपचाप बैठा रहता है, बिस्तर पर पड़ा रहता है। उसका किसी काम में मन नहीं लगता और न ही कोई काम करता है। हमेशा उदास रहता है एवं नकारात्मक बातें करता है। जैसे दुनिया बेकार है, दुनिया में कुछ नहीं रखा है, अपने आपको दोष देना, नींद ठीक से न आना, कभी जल्दी जाग जाना, कभी-कभी आत्महत्या करने जैसे विचार मन में आना आदि अवसाद के लक्षण हैं।
इसके उपचार के लिए साइकोथेरेपी एवं दवा की जरूरत होती है। साथ्‍ा ही इस तरह के रोगियों के लिए परिवार के सहारे एवं सहयोग की विशेष आवश्यकता होती है। इस
तरह के व्यक्ति से हमेशा सकारात्मक बातें करनी चाहिए और उनके मनोबल को हमेशा ऊंचा बनाए रखने की जरूरत होती है।
सिजोफ्रेनियाःschizophrenia पागलपन यानी सिजोफ्रेनिया महिलाओं एवं पुरुषों में समान रूप से देखने को मिलते हैं। इस बीमारी को लोग युवावस्था की स्वभावगत समस्या या युवाओं की सनक मानने की भूल कर बैठते हैं। इसलिए जागरूकता और जानकारी के अभाव में सही समय पर चिकित्सा शुरू नहीं हो पाती। जिससे बीमारी गंभीर रूप धारण कर लेती है। इससे पीड़ित व्यक्ति को अक्सर तरह-तरह की आवाज सुनाई देती हंै। जैसे, कभी बच्चे के रोने की, कभी किसी जंगली जानवर की आवाजें, जबकि आसपास कुछ भी नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति अकेले में नहीं रह सकता एवं अंधेरे से बहुत डरता है। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, सही समय पर जल्द-से-जल्द इलाज। डॉक्टर की सलाह से दवाएं शुरू करने और नियमित सेवन करने से एक तिहाई मरीज सामान्य जीवन जीने लगते हैं।
ऑब्सेसिब कम्पलसिव डिस्‍ऑर्डरः(obsessive compulsive disorder) इस समस्या को साधारण अर्थ में आप झक या सनक कह सकती हैं। यह समस्या महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा देखने को मिलती है। इसमें व्यक्ति दिनभर अपने हाथ साबुन से धोता रहता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसके हाथ में संक्रमण न हो और यह संक्रमण उसके परिवार के सदस्य को न लग जाए। घर से बाहर जाते समय वह ताले को बार-बार खिंचकर देखता है कि कहीं ताला खुला तो नहीं रह गया। कई बार कुछ दूर जाने के बाद वापस आकर ताले को फिर से खींचकर देखता है कि कहीं ताला खुला तो नहीं रह गया। कुछ महिलाएं कई बार रसोई में कार्य करते समय बहुत देर तक खड़ी रहती हैं किसी सोच में। वे तब तक दोबारा कार्य शुरू नहीं कर पाती हैं, जब तक उनके दिमाग में सही सोच नहीं आती है। यह एक गंभीर मानसिक रोग होता है। ऐसा होने पर तुरंत मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिलें। सही उपचार एवं दवा से इस समस्या को रोका जा सकता है। 

पूरे विश्व में तेजी से बढ़ती मानसिक रोगियों की संख्या को देखते हुए, आज जरूरत है इनके प्रति लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की। साथ ही इन रोगों के पुख्ता इलाज तलाशना भी जरूरी है।
आमतौर पर देखा जाए, तो ज्यादातर मामलों में भय का कोई वास्तविक कारण नहीं होता। भय सिर्फ हमारे विचारों में, मस्तिष्क में एवं कल्पनाओ में होता है। हमारा मस्तिष्क अक्सर हमारे दिमाग में आने वाली कपोल कल्पनाओं पर ही प्रतिक्रिया करता है। जबकि स्वस्थ्य मस्तिष्क ही कपोल कल्पनाओं एवं डर का सही आकलन कर पाता है। स्वस्‍थ्य मस्तिष्क के लिए हमें अपने व्यक्तित्व के सकारात्मक पहलू को उभारने की आवश्यकता होती है। हमेशा अच्छे कार्य करें। हमेशा सकारात्मक सोचें, क्योंकि लोगों को सबसे ज्यादा भय नकारात्मकता से लगता है। अगर हम नकारात्मक सोचना बंद कर दें, तो काफी हद तक भय से छुटकारा पाने में सक्षम हो जाएंगे।
 
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