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झट से पकड़े किसी का झूठ, इन तरीकों से

बच्चे हों या बड़े, विद्यार्थी हो या प्रोफेशनल, सच बोलने की सलाह सबको दी जाती है और बेहतर जीवन के लिए यह जरूरी भी है। झूठ बोलना किसी भी समाज में बुरा माना जाता है। सत्य की राह पर चलने की प्रेरणा हमारे महापुरुष भी देते रहे हैं। महापुरुषों की नसीहत और झूठ बोलने से होने वाले नुकसान के बावजूद लोग झूठ बोलने से बाज नहीं आते, इंटरव्यू में भी, कारोबार में भी और आम जीवन में भी। ध्यान रखें कि कम से कम इंटरव्यू में तो आप झूठ का सहारा बिल्कुल ही न लें। इससे एक तो आपकी छवि खराब होगी और आप जॉब से भी हाथ धो बैठेंगे। गौरतलब है कि इंटरव्यू या अन्य अवसरों पर यदि आप झूठ का सहारा लेते हैं, तो आपका शरीर भी आपका साथ नहीं देता है और आपके झूठ को प्रकट कर देता है। झूठ बोलते वक्त जो भी शारीरिक बदलाव होते हैं, उन्हें इंटरव्यूअर फौरन समझ जाते हैं। ऐसे में भलाई इसी में है कि आप न तो बायोडाटा में कुछ गलत लिखें और न ही साक्षात्कार के दौरान ऐसा कोई प्रयत्न करें। सच को छुपाकर झूठ बोलते वक्त शरीर में जो बदलाव होते हैं, उनमें खास हैं :
  • बोलने के वक्त यदि कोई झूठ बोल रहा है, तो उसका चेहरा तनावग्रस्त दिखाई देने लगता है, हालांकि उसकी कोशिश यही रहती है कि वह खुद को सामान्य ढंग से पेश करे। पर इंटरव्यूअर उसकी बात को समझ जाता है।
  • झूठ बोलते वक्त आंखों की गतिविधियों से भी व्यक्ति के झूठ का पता लगता है। ऐसा व्यक्ति आई कॉन्टैक्ट की कोशिश कुछ ज्यादा ही करता है। इसके विपरीत सामान्य स्थिति में व्यक्ति रिलैक्स्ड रहता है और बीच-बीच में इधर-उधर भी देखता रहता है।
  • झूठ बोलने वाले की पलकों के खुलने और बंद होने की गति भी बढ़ जाती है।
  • झूठ बोलने अथवा नर्वस होने वाला बार-बार अपने कान या गर्दन के पिछले हिस्से को छूता रहता है, जिसे उसकी झूठ या गलती पकड़ में आ जाती है।
  • सवाल पूछने पर वह अपना चेहरा या बॉडी दूसरी दिशा में घुमाने का प्रयत्न करता है।
  • झूठ बोलने की स्थिति में बोलने वाला कभी बेहद तेज गति से, तो कभी बिल्कुल धीमा बोलने लगता है, जिससे उसकी गलती पकड़ में आ जाती है।
  • बोलते वक्त व्यक्ति हकलाने लगता है और किसी बात को भी सामान्य ढंग से बोलने में खुद को असमर्थ पाता है। वह विषय से भटक भी जाता है या अपनी जानकारी का प्रदर्शन कुछ ज्यादा ही करता है।
  • व्यक्ति को झूठ बोलते वक्त सामान्य से अधिक पसीना आता है।
 
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