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कुछ बच्चो में परीक्षा फोबिया होता है उन्हें माता पिता सहज रूप से मोटीवेट करें की परीक्षा से घबराजे या डरने की जरूरत नहीं है| आज का दौर हमारे उस समय जैसा नही हैं जब हमार पेरेंट्स हमें डांटते तो थे ही, पिटाई भी कर देते थे और हम चुपचाप स्वीकार कर लेते थे|

यह समय बच्चों की परीक्षा का तो है ही, साथ ही अभिभावकों की भी परीक्षा का समय है| इस दौरान माता-पिता का पूरा सहयोग अपेक्षित है| बच्चा नर्वस है समय उन बातों का उलाहना देकर कटाक्ष मत करिए उसमें आत्म विश्वास इतना कूटकूटकर भरिए कि वे पूरी तरह से पढ़ाई में जुट जाएं| उससे धमकाइए भी नहीं कि अगर तुम्हारे कम नंबर आये तो घर से निकाल देंगे, तुम्हारे हाथ-पैर तोड़ देंगे| इतनी मारेंगे कि हमेशा के लिए मस्ती करना भूल जाओगे| कुछ बच्चों में परीक्षा फोबिया होता है| उन्हें माता-पिता सहज रूप से मोटिवेट करें कि परीक्षा से घबराने या डरने की जरूरत नहीं है| उन्होंने सब पढ़ा है| इसलिए सब आता है| आप सब जानते ही हैं कि आज का दौर हमारे डांटते तो थे ही, पिटाई भी करते थे और हम उसे चुपचाप स्वीकार करलेते थे| आजकल तोबात-बात पर बच्चे घर छोड़ देते हैं, गलत कदम उठाते हैं| कुछ साल पहले हमारे पड़ोसी के बेटे ने दसवीं की परीक्षा दी थी| परिणाम के वक्त वह डर कर कुछ दोस्तों के साथ घर से भाग गया| जो बच्चा सामने आंख न उठा सकता हो, वह ऐसा। कदम उठा लेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था| मगर वह डर गया था कि नंबर कम आने पर उसके पिता उसकी खाल उधेड़ देंगे| पड़ोसी को मैंने समझाया और डांटा भी था कि बच्चे को ऐसे डांटा जाता है कि घर से भाग जाये, अब जब वह चला गया तो क्यों परेशान हो? तुमने ही उससे कहा था ना कि घर से निकाल देंगे| उसने कहा कि वह तो गुस्से से कहा था| हमें क्या पता था वह घर छोड़ देगा! पड़ोसी इतना हंसमुख और इतना चहकता है कि उसके आने का पता चल जाता है| हमारी सोसाइटी में वह बहुत पॉपुलर है, मगर उन दिनों हम सब उसकी आवाज सुनने को तरस गये| उसकी पत्नी ने भी खाना-पीना छोड़ दिया| एक तो बच्चे के भागने का दुख और ऊपर से उसकी पत्नी ने खाना छोड़ दिया| वह परेशान था कि पत्नी को कुछ न हो जाये| अखबार में विज्ञापन भी दिया गया| 15 बाद दिन कलकत्ता से फोन आया जो उसके बेटे ने किसी के मोबाइल से किया था| वह जिन लड़कों के साथ भागा था, वे दो-तीन जगह होकर कलकत्ता पहुंचे थे| रुपये नहीं थे तो होटल में बरतन धोये|
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साथ के बच्चों ने झगड़ा किया| फिर वो वहां से भी भागने की सोचने लगे| उसके बेटे को भी पता चल चूका था की बिना माता पिता के जीना कितना मुश्किल है जब फोन आया तो पड़ोसी ने कहा तुम जैसे भी हो आ जाओ| तुम्हारी मां खाना नहीं खा रही है| बच्चा और वे दोनों रोने लगे|उस इन्सान का भला हो जिसने टिकट खरीदकर बच्चे को गाड़ी में बैठाया| ईश्वर का भी धन्यवाद कि वह किसी गलत हाथों में नहीं पड़ा| वरना पता नहीं क्या होता और कहां जाता? ट्रेन रात के 2 बजे आनी थी और वह 11 बजे ही स्टेशन चला गया था| ट्रेन काफी लेट थी, मगर वह वहीं रहा| जब उसे घर लेकर पहुंचा तो बच्चे ने मां को अपने हाथों से खिलाया और जब वह अगले दिन हमारे यहां आया तो उसी तरह से चहक रहा था जैसे पहले चहकता था| उसके चेहरे पर वही पुरानी खुशी दिखाई दी| इस वाकये के कुछ दिन बाद एक खबर छपी थी, दसवीं में कम नंबर आने पर एक छात्र ने फांसी लगा ली| यूं तो हम ऐसी घटनाएं अक्सर ही पढ़ते बच्चे के घर से भागने की घटना मेरे सामने की है| उस बेहाल-बदहवास पिता को मैंने देखा है| बच्चों से बढ़कर कुछ भी नहीं बच्चे तो माता-पिता की जान होते हैं| वे चाहें कितनी भी बड़ी गलती करें पेरेंट्स माफ कर देते हैं| हां, गुस्सा इसलिए होते हैं क्योंकि वो बच्चों का भला चाहते हैं| बच्चों को भी माता पिता के स्नेह को समझना होगा|

परीक्षा के दौरान इस तरह करें बच्चो के केयर

परीक्षा के दौरान पेरेंट्स को खास ख्याल रखना होगा कि वे मेहमानों की आवाजाही पर रोक लगाएं| पार्टी वगैरह का आयोजन न करें| घर में शादी होती भी बच्चों को अकेले छोड़कर न जाएं| आपका कोई भी अपना बच्चों का बुरा नहीं चाहेगा, न बुरा मानेगा और जो बुरा मानेगा वो आपका शुभचिंतक हरगिज नहीं हो सकता| परीक्षा के बाद भी आप सब उनसे मिल सकते हैं|अगर आपको टीवी-सीरियल देखने की आदत है तो इस आदत को कुछ दिन भूल जाएं| नहीं तो आपको टीवी के सामने बैठा देख उनका मनभी टीवी देखने का हो सकता है| वे हैं तो आखिर बच्चे ही|इस दौरान उन्हें समझाकर और अंतिम परीक्षा के बाद फोन लौटाने का वादाकर आप उनसे फोन लेकर रख लें| जब जरूरत होती उन्हें फोन दीजिए|उनके खाने-पीने का ख्याल रखें| इस वक्त उनका जो खाने का मन हो, उन्हें दें जिससे वे बिना किसी तनाव के पढ़ने में ध्यान लगा सकें लेकिन ज्यादा गरिष्ठ चीजें न दें जिससे वे उनको नींदा आनी शुरू हो जाए

 
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