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दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति ने दिया इस्तीफा एडमिशन पर सस्पेंस

www.nvrthub.com न्यूज़: नई दिल्ली: महाभारत के टाइम से जिस शिक्षक व शिष्य को गहरा व अत्ति आदरपूर्वक समझा जाता था आज ना तो शिष्य ही ऐसे हैं और ना ही शिक्षक। आजकल मैं, हम इस तरह एक अहम के कारण कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ कहें या फिर वजह कुछ और लेकिन एक नया ताज़ा मामला अब देश के सबसे अलग व टॉप यूनिवर्सिटी ऑफ़ दिल्ली में एक ड्रामा चल रहा है लेकिन ये एक तरह से बिलकुल मनोरंजन की तरह है क्योंकि जिस तरह से यूनिवर्सिटी के कुलपति दिनेश सिंह ने पद से इस्तीफा दिया उससे तो यही लगता है की यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (युजीसी) व सभी शैक्षिक या तो इनके अनुसार चले या फिर इनको इन सब बड़ी संस्थाओ के दिशानिर्देशो की अवहेलना से करने से कुछ हल निकल सकता है। इन सब के कारण ना केवल कॉलेज बल्कि सभी बच्चे भी सकते में हैं आखिर इस घड़ी में किया जाए तो क्या? 
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क्या था मामला अखिर क्यों देना पड़ा उपकुलपति को इस्तीफा?

दरअसल 2012 में युजीसी की कमिटी ने एक निर्णय लिया था की ग्रेजुएट कोर्सेज तीन साल के ना होकर चार साल के कर दिए जाए और डीयु ने उसको तत्काल प्रभाव से लागु भी कर दिया था लेकिन अब विश्वविद्यालय अनुदान आयौग ने अपने पिछले फैसले को बदलते हुए नये स्तर 2014-2015 में स्नातक प्रोग्राम को तीन साल का कर दिया जाए। लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर इस फैसले को मानने के लिए तैयार नही थे तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अब आखिर कितने दिनों के लिए और इंतजार करना होगा स्टूडेंट्स को। खैर अब तो आने वाले दिनो में पता लगेगा हलांकि इस पेंच में कोई भी घुसने को राजी नही है क्योंकि खुद केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने किनार बनाये हुए हैं। वहीं कुछ लोग अपनी पॉलिटिक्स चमकाने में लगे हुये हैं।
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शिक्षक वर्सेज विधार्थी गुरु शिष्य का क्या रिश्ता अब क्या है

पहले जहाँ शिक्षक अपने बच्चो से बढकर एक शिष्य को शिक्षा दी जाती थी वहां अब शिक्षा का व्यावशायीकरण का हो गया पहले जहाँ, गुरु शिष्य एक दुसरे के पूरक व आदर दिया जाता था, शिक्षक ही देश की नीव होता है, लेकिन नीव कमजोर हो चुकी है क्योंकि जिमेदारी शिक्षक लेता नही है, पॉलिटिक्स के चहेते शिक्षको को नौकरी पे रखा जाता है। ऐसे में ये देश किस रहा पर चल रह है, आखिरकार क्या होगा इस देश का जहाँ पहले हम दूर की सोचते थे की देश के अच्छे दीं आने वाले हैं वहीं अब शिक्षा अब शिक्षा ना रहकर भिक्षा हो गयी है और वो भी पैसो से खरीदी हुई।
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