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कैपिटल गेन्स (Capital Gains): तब होता है जब निवेशक किसी संपत्ति को मुनाफे पर बेचता है। आयकर कानून में कैपिटल असेट्स को परिभाषित किया गया है और कहा गया है कि निवेशक को शॉर्ट और लॉन्ग टर्म गेन्स पर लागू टैक्स देना होगा। कैपिटल असेट की होल्डिंग पीरियड से उसके वर्गीकरण के बारे में पता चलता है। निवेशक को किसी वित्त वर्ष के सभी कैपिटल गेन्स को बही खाते में दर्ज करना होता है और आयकर रिटर्न फाइल करने से पहले उस पर लागू टैक्स का भुगतान करना होता है।
 
capital gains tax on real estate
देनदारी (Debts): कैपिटल गेन्स टैक्स कैपिटल असेट की बिक्री पर देना होता है। यह टैक्स रेट और असेट के न्यूनतम होल्डिंग अवधि पर निर्भर करता है। अगर किसी असेट की सेल पर गेन्स होता है तो उस पर टैक्स की देनदारी बनती है।

मल्टीपल सेल (Multiple Sale) : टैक्स देनदारी का पता लगाने के लिए किसी वित्तीय वर्ष के सभी ट्रांजैक्शन को जोड़ना होता है। मल्टीपल ट्रांजैक्शन में फस्र्ट इन फस्र्ट आउट रूल लागू होगा, मतलब जो असेट पहले खरीदा गया है, वह पहले बिका माना जाएगा।
 
भुगतान (Payment): जो व्यक्तिगत टैक्स उद्देश्य से अपने अकाउंट का ऑडिट कराते हैं उनको कैपिटल गेन्स टैक्स अडवांस टैक्स के तौर पर चुकाना होता है। बाकी मामलों में यह आयकर रिटर्न की फाइलिंग से पहले सेल्फ असेसमेंट टैक्स के तौर पर चुकाया जाता है।

एसटीटी (STT): जिन मामलों में एसटीटी चुकाया जाता है, उनमें टैक्स रेट जीरो या बहुत कम होता है। किसी भी निवेशक के लिए एसटीटी भुगतान का प्रमाण रखना जरूरी है।
लॉस सेट ऑफ (Loss Set Off): कैपिटल लॉस को कैपिटल गेन्स से सेट ऑफ किया जा सकता है। लेकिन इसके जरूरी है कि रिटर्न टाइम पर भर गया हो। रिटर्न फाइल करने में देरी होने पर वह इसका फायदा नहीं ले पाएगा।
 
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