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वैश्विक हब बनने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना को लगा धक्का


छोटी कारों के निर्यात के लिए एक वैश्विक हब बनने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना को धक्का लगा है। यूरोप को कारों का निर्यात घटने और पड़ोस में प्रतिकूल माहौल के चलते भारत दो अरब डालर के अवसर से चूक गया।
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सोसाइटी आफ इंडियन आटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स के अप्रैल-जुलाई के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, कारों का निर्यात 5.02 प्रतिशत घटकर 1,71,274 इकाइयों का रहा जो बीते साल की इसी अवधि में 1,80,332 इकाइयों का था। सियाम के महानिदेशक विष्णु माथुर ने कहा, आज भारतीय कारों का निर्यात नयी दिशा ले रहा है। पहले ज्यादातर निर्यात यूरोप और दक्षिण एशिया को होता था, लेकिन दोनों जगह नरमी है और कंपनियां लातिन अमेरिका व अफ्रीका में नए बाजार तैयार करने पर ध्यान दे रही हैं। यूरोप और पड़ोसी देशों में हुए घाटे से उबरने में समय लगेगा। भारत की सबसे बड़ी कार निर्यातक हुंदै ने यूरोप के लिए माडलों का उत्पादन तुर्की व चेक गणराज्य ले जाने के बाद अपने चेन्नई संयंत्र से यूरोप के लिए निर्यात बंद कर दिया है। कंपनी के इस कदम से उसके चेन्नई संयंत्र से निर्यात में करीब 25 प्रतिशत की कमी आएगी और इस साल यह 1.9 लाख इकाइयों का रह जाएगा जो पिछले साल 2.53 लाख इकाइयों का था। पिछले साल भारत से कारों के कुल निर्यात में हुंदै का 45 प्रतिशत योगदान रहा।

दूसरी ओर, र्शीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में चुनौतियों से भी भारत ने कारों के निर्यात के अवसर गंवाए हैं। माथुर ने कहा, हमारे पड़ोस में, र्शीलंका को निर्यात पर रोक है, जबकि बांग्लादेश सेकेंड हैंड वाहनों का बाजार बन गया है और इसी तरह की स्थिति नेपाल व भूटान में है जिससे हमारी छोटी कारों का निर्यात गैर-प्रतिस्पर्धी बन गया है।
 
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