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कंपनी जिसने बदल दी दुनिया 1981 में सिटी ग्रुप ने डाइनर्स क्लब का कर लिया था अधिग्रहण

हैमिल्टन क्रेडिट कॉरपोरेशन के हेड फ्रैंक मैक्नमारा 1949 में अपने दो दोस्तों एल्फ्रेड और रैल्फ के साथ न्यूयॉर्क के फेमस रेस्त्रां केबिन ग्रिल में भोजन कर रहे थे। बिल पे करने के दौरान मैक्नमारा को पता चला कि वे अपना पर्स लाना ही भूल गए हैं। उन्होंने फोन कर पत्नी को बुलाया और बिल चुकाया। मैक्नमारा ने तभी तय कर लिया कि वे कुछ ऐसा करेंगे, जिससे दोबारा कभी इस शर्मिंदगी का सामना नहीं करना पड़े। काफी विचार करने के बाद उन्हें एक ऐसे क्रेडिट कार्ड का आइडिया आया, जिसे बिना कैश के कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता हो।
जबकि इस दौरान क्रेडिट पर सामान लेने के लिए चार्ज कार्ड पहले से चलन में थे। ये कार्ड डिपार्टमेंटल स्टोर, गैस स्टेशन और अन्य कंपनियां ग्राहकों को खुद से जोड़े रखने के लिए उन्हें देती थीं।
बिना किसी ब्याज के प्रॉफिट कमाने के लिए क्लब ने उन संस्थानों से प्रति ट्रांजेक्शन सात प्रतिशत फीस लेनी शुरू की, जो उनका कार्ड स्वीकार करते थे। जबकि इन कार्ड को इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों से वार्षिक फीस के नाम पर तीन डॉलर लिए जाते। कंपनी ने 1950 में सबसे पहले 200 लोगों को अपने क्रेडिट कार्ड दिए। इनमें से अधिकतर तीनों पार्टनरों के दोस्त और परिचित थे। कार्ड कागज का था, जिसके पिछले हिस्से में उन स्टोर्स और दुकानों के नाम प्रिंट थे जहां यह स्वीकार्य था।
जानिए कब कैसे कहाँ हुई स्टार्टिंग
frank mcnamara credit history
ऐसे में लोगों को अपने साथ अलग-अलग कंपनियों के दर्जनों कार्ड रखने पड़ते थे। मैक्नमारा ने अपने आइडिया को एल्फ्रेड और रैल्फ के साथ शेयर किया और तीनों ने कुछ पूंजी मिलाकर 1950 में डाइनर्स क्लब की स्थापना कर दी। डाइनर्स क्लब कंपनी और उसके ग्राहकों के बीच मिडिलमैन बन गया था, जो कहीं से भी खरीदारी के लिए उधार देने लगा।
  • फ्रैंक मैक्नमारा   
  • डाइनर्सक्लब
  • संस्थापक:
  • फ्रैंकमैक्नमारा, रैल्फ सैनिडर, एल्फ्रेड ब्लूमिंगडेल
  • मुख्यालय:
  • इलिनॉय,अमेरिका
  • स्थापना:1950

मैक्नमारा की क्रेडिट कंपनी का फोकस मुख्य तौर पर अलग-अलग कंपनियों में काम करने वाले सेल्समैन पर था, जो अपने ग्राहकों को खुश करने के लिए रेस्त्रां में उन्हें भोजन कराते। डाइनर्स क्लब को जरूरत थी कि वो ज्यादा से ज्यादा रेस्त्रां मालिकों को उनके कार्ड को स्वीकार करने के लिए राजी कर लें। शुरुआत में 14 रेस्त्रां इसके लिए राजी भी हो गए। लेकिन चुनौतियां कम नहीं हुईं। व्यापारी डाइनर्स क्लब की प्रति ट्रांजेक्शन सात प्रतिशत फीस देने को राजी नहीं थे, क्योंकि वे अपने स्टोर्स के कार्ड्स का कोई कंपीटिशन नहीं चाहते थे। जबकि अधिक जगह इनके कार्ड्स स्वीकार नहीं किए जाने से कस्टमर्स इसे लेने को तैयार नहीं थे। हालांकि धीरे-धीरे समस्याएं दूर होती गईं और 1950 तक 20 हजार लोग डाइनर्स क्लब के कार्ड इस्तेमाल करने लगे थे।

दूसरे साल क्लब का बिजनेस तेजी से बढ़ा और उसने 60 हजार डॉलर का प्रॉफिट कमाया। इसके बावजूद मैक्नमारा का अपने काम से मन भर गया और 1952 में उन्होंने कंपनी में अपना शेयर दो लाख डॉलर में दोनों पार्टनरों को बेच दिया। 1958 तक कंपनी को कोई कंपीटिशन नहीं था, लेकिन इसी साल अमेरिकन एक्सप्रेस का क्रेडिट कार्ड भी बाजार में गया। 1961 में डाइनर्स क्लब ने प्लास्टिक के क्रेडिट कार्ड देना शुरू किया। 1981 में सिटी ग्रुप ने इसका अधिग्रहण कर लिया।
 
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