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गुरुभक्त आरुणि की कहानी नई तो नहीं है, लेकिन शायद तुमने पढ़ी नहीं! क्या तुम जानते हो कि आरुणि ने अपने गुरु के वचन का कैसे पालन किया था? उनकी गुरुभक्ति देखकर सभी हैरान रह गए और गुरु ने भी खुश होकर उन्हें आर्शीवाद दिया...
यह राजा-महाराजाओं के समय की कहानी है। उस वक्त आज की तरह स्कूल या टीचर नहीं हुआ करते थे। सभी बच्चे आश्रम में ऋषि-मुनियों से शिक्षा लेते थे। उस समय के एक बड़े ऋषि थे- महर्षि आयोदधौम्य। महर्षि आयोदधौम्य के आश्रम में बहुत से बच्चे शिक्षा के लिए आते थे। लेकिन उनके तीन शिष्यों आरुणि, उपमन्यु और वेद की कहानियां काफी मशहूर हैं। इनमें से आरुणि अपने गुरुदेव के सबसे प्रिय शिष्य थे। एक दिन शाम के समय बारिश होने लगी। महर्षि ने सोचा कि कहीं धान के खेत की मेड़ ज्यादा पानी भरने पर टूट जाएगी तो खेत में से सब पानी बह जाएगा। फिर बारिश न हो तो धान बिना पानी के ही सूख जाएंगे। उन्होंने आरुणि से कहा, ‘बेटा आरुणि, तुम खेत पर जाओ और देखो, कहीं मेड़ टूटने से खेत का पानी निकल न जाए।’गुरुदेव की आज्ञा से आरुणि बारिश में भीगते हुए खेत पर चले गए। वहां उन्होंने देखा कि धान के खेत की मेड़ एक जगह से टूट गयी है। वहां से पानी बाहर जा रहा है। आरुणि ने वहां मिट्टी रखकर मेड़ बांधना चाहा। पानी तेज रफ्तार से निकल रहा था और बारिश से मिट्टी गीली हो गई थी। आरुणि जितनी मिट्टी मेड़ बांधने को रखते थे, उसे पानी बहा ले जाता था। बहुत देर मेहनत करके भी जब आरुणि मेड़ नहीं बांध सके, तो वे उस टूटी मेड़ के पास खुद ही लेट गये। उनके शरीर से पानी का बहाव रुक गया।
रात भर आरुणि पानी भरे खेत में मेड़ से सटे लेटे रहे। सर्दी से उनका शरीर अकड़ गया। उनके शरीर से पानी का बहाव रुक गया। सुबह होने पर हवन करके सब शिष्य गुरुदेव को प्रणाम करते थे। महर्षि आयोदधौम्य ने देखा कि आज आरुणि प्रणाम करने नहीं आया। महर्षि ने दूसरे शिष्यों से पूछा-आरुणि कहां है?उन्होंने कहा, ‘कल शाम को आपने आरुणि को खेत की मेड़ बांधने को भेजा था, तब से वह लौटकर नहीं आया।’ महर्षि उसी समय दूसरे शिष्यों को लेकर आरुणि को ढूंढने निकल पड़े। उन्होंने खेत पर जाकर आरुणि को पुकारा। आरुणि से ठंड की वजह से बोला तक नहीं जा रहा था। उन्होंने किसी तरह गुरुदेव की पुकार का उत्तर दिया। महर्षि ने वहां पहुंचकर उस आज्ञाकारी शिष्य को उठाकर सीने से लगा लिया और आर्शीवाद दिया, पुत्र आरुणि तुम्हें सब विद्याएं अपने आप ही आ जाएं। गुरुदेव के इसी आर्शीवाद से आगे चलकर आरुणि बड़े विद्वान बने।
 
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