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दफ्तर में साथ काम करने वाले सहयोगी ओझा जी का बेटा अकस्मात इतना खतरनाक बीमार हुआ कि तुरंत अस्पताल में दाखिल कराना पड़ गया। मैंने वहां जाकर देखा कि लड़के की दशा निरंतर बिगड़ती जा रही थी। कई डॉक्टर और नर्सें इधर-उधर बदहवास से दौड़ते दिखाई पड़ रहे थे।
परिवार के सभी छोटे बड़ अस्पताल में मौजूद थे, बस वह बेटी ही मौजूद नहीं थी, जिसका तीन महीना पहले विवाह हुआ था। घर-परिवार बीमार को लेकर इतने हलकान थे कि लड़की को भाई की बीमारी की सूचना ही नहीं भेज सके थे। बेटे की दशा पल-पल गिरती देखकर चिंतातुर ओझा जी मुझे एक तरफ ले जाकर बोले, ‘सरन साहब, बबलू की जिंदगी का अब कुछ ठीक-ठिकाना नहीं है। किसी तरह सविता को यहां लाना जरूरी हो गया है। क्या करें किसे भेजें? पिता जी की उम्र तो अब दौड़ भाग की है नहीं।’
मैंने उन्हें आश्वस्त किया, ‘बस आप सुमित्रा का पता दे दीजिए मैं तुरंत यहीं से निकल लेता हूं।’
वह बोले, ‘लड़की का नाम सुमित्रा नहीं सविता है।’ साथ ही उन्होंने एक कागज पर पता घसीटकर कहा, ‘पलवल के लिए इस समय एक ट्रेन भी जाती है। मगर आप जैसे चाहें निकल जाएं।’
बस अड्डा स्टेशन की अपेक्षा ज्यादा नजदीक था। मैंने रिक्शा पकड़ और दिल्ली जाती जो भी बस सामने पड़, उसी में चढ़ गया। पर टिकट लेते समय मैंने देखा कि मेरी जेब में ज्यादा रुपये नहीं है। परंतु यह सोचकर निश्चिंत हो गया कि गाजियाबाद से पलवल ज्यादा दूर नहीं है, इसलिए ज्यादा रुपयों की दरकार ही क्या?
मैंने दिल्ली से पलवल के लिए दूसरी बस पकड़ और लगभग डेढ़ घंटे में पलवल पहुंच गया। सविता की जगह सुमित्रा नाम कुछ मेरी जुबान पर ऐसा चढ़ गया था कि उसके घर जाकर भी मैंने उसे सुमित्रा ही कहा।
मुझे यों यकायक आया देखकर उसे हैरानी तो हुई मगर उसकी आंखों में खुशी भी कम नहीं थी। पर जरा देर बाद ही वह कुछ परेशान भी दिखी।
मैंने इधर-उधर देखकर उससे पूछा, ‘बिटिया इस घर में कोई भी दूसरा प्राणी नजर नहीं आ रहा है। सबकेसब कहां चले गए?’
वह बोली, ‘अंकल जी मेरी सास पूजा करने मंदिर गई हैं, बस आती ही होंगी।’ साथ ही मैंने उसे बबलू की बीमारी केबारे में बता दिया और बोला, ‘बेटी तुम तुरंत तैयार होकर निकल चलो। देर का काम नहीं है।’
वह फुसफुसाकर बोली, ‘अंकल जी, यही मोहल्ले की दुकान से आप थोड़ मिठाई ले आइए।’ सहसा मुझे याद आया कि मैं मायके का आदमी हूं। मुझे खाली हाथ इस घर में नहीं आना चाहिए था।
मैंने अपनी गलती महसूस करते हुए कहा, ‘मैं हॉस्पिटल से सीधा आ रहा हूं। बदहवास, मुझे फल मिठाई लाने का खयाल ही नहीं रहा।’ हालांकि मेरे पास ज्यादा रुपये नहीं थे, फिर भी मैं घर से निकल गया और उसकी बताई हुई दुकान से मिठाई ले आया।
जब वह तैयार हो रही थी, तो मैंने पूछा, ‘दामाद बाबू कहां हैं?’
‘वो तो कल शाम चंडीगढ़ गए हुए हैं। शाम से पहले नहीं लौटेंगे।’ फिर उसने धीमे स्वर में कहा, ‘अंकल जी मेरी दो ननदें स्कूल गई हुई हैं। उन्हें आप इक्यावन-इक्यावन और सासू जी को एक सौ एक रुपये का शगुन जरूर दे देना। नहीं तो वह बुरा मानेंगी।’
उसकी बात सुनकर मेरे पांव के नीचे से जैसे धरती ही सरक गई। इतने बीमार भाई के बारे में उसने अभी तक एक बार भी चिंता जाहिर नहीं की थी, जितनी कि सास-ननदों के सगुन को लेकर तथा मिठाई को लेकर चिंतित थी।
बाहरी तौर पर वह घर पूरी तरह संपन्न दिखता था। आधुनिकता का अभास देने वाली हर चीज उस घर में मौजूद थी। यह कैसा विपर्यय था कि बहू के मैके का आदमी बहू केइकलौते भाई की गंभीर बीमारी की सूचना लेकर पहुंचा है, तब भी उस घर की बहू, सास-ननद को सगुन के रुपए देने की बात ही सोच-सोचकर हलकान-परेशान हो रही है।
इधर मेरी जेब में वापस लौटने के पैसों का भी जुगाड़ नहीं था। यहां की परिस्थिति के बारे में जरा भी पता होता, तो कुछ न कुछ व्यवस्था करके ही शहर से बाहर निकलता।
मैंने गहरे संकोच में पड़कर यह बात लड़की को बतलाई और अपनी असमर्थता व्यक्त की तो वह बोली, ‘उसकी आप फिक्र न करो।’ और उसने दो सौ तीन रुपये लाकर मेरे हाथ में दे दिए।
इसी समय सविता की सास मंदिर से लौट आईऱ्ं। उनके हाथों में बांस से बुनी एक छोटी सी डोलची और तांबे की लुटिया थी। वह एक भरी पूरी उज्ज्वल वर्णा रौबीली अधेड़ औरत थी। अभी भी वह होठों को हिलाकर बुदबुदा रही थी, जैसे कि वह भगवान का जाप कर रही हो।
मैंने उस अनासक्त सी दिखती महिला को बबलू की संगीन बीमारी के बारे में बतलाकर सविता को तुरंत ले जाने की बात भी कह दी।
उसने लुटिया आंगन में रखे तुलसी केबिरवे में रख दी और बोली, ‘रोटी पानी करके चले जाना। हरिंदर होता, तो गाड़ से ले जाता। पर वह तो कल से ही चंडीघड़ गया है।’
उसके बोलने से मैं समझ गया कि वह एक अपढ़ औरत है और चंडीगढ़ को भी चंडीघड़ बोलती है।
मैंने मौके की नजाकत देखते हुए उससे कहा, ‘बहन जी, लड़केकी हालत अब तब है और हमें वहां पहुंचने में भी कम से कम तीन चार घंटे का वक्त लग ही जाएगा। इस समय तो आप हमें जितनी जल्दी निकल जाने दें, उतना ही अच्छा है।’
फिर उस स्थिर निगाह वाली औरत ने कोई आग्रह नहीं दिखाया और सविता से बोली, ‘बहू, देर-फेर मत लगाओ, जैसे तेरे चाचाजी कह रहे हैं, वैसे ही कर। हां, गहने-पत्ते लेकर जावे, तो नेक होशियारी से जाना।’
सविता बोली, ‘मां जी, गहने ले जाके क्या करना है? गहने पहनकर जाने का यह मौका ही कहां है?’
बुढ़या बोली, ‘हां, मैं भी यहीं कह रही हूं।’
जब मैं सविता को लेकर उस घर से निकलने को था, तभी मैंने सविता के दिए हुए वह दो सौ तीन रुपये की गड्डी उस औरत की ओर बढ़ते हुए कहा, ‘यह तुच्छ सी भेंट समझिए, इक्यावन-इक्यावन बेटियों को दे दें, और एक सौ एक रुपये आपके चरणों में न्योछावर हैं।’
उस औरत के चेहरे की स्थिरता, विराग और सख्ती एक क्षण में ही फुर्र हो गई। वह माधुर्य मंडित स्वर में बोली, ‘इत्ते रुपयों की भला क्या जरूरत है। मन का तो एक रुपया ही भतेरा होता है।’ पर साथ ही उसने मेरे हाथ से रुपये लेने में एक पल भी नहीं गंवाया।
जब हम दोनों घर की चौखट लांध गए, तो उसने सुझाया, ‘जरा होशियारी से, जमाना खराब है।’
मैंने सविता की ओर निगाह उठायी, तो देखा कि गहने के नाम पर उसके कान में बाली और बाएं हाथ की अनामिका में महज एक अंगूठी थी। उसने ससुराल पक्ष की ओर से चढ़या गया कोई भी कीमती आभूषण नहीं पहन रखा था।
बस स्टैंड पर जाकर देखा, वहां गाजियाबाद जाने वाली कोई बस तैयार नहीं थी। दिल्ली जाकर अंतरराज्यीय बस स्टैंड से ही बस पकड़ने की विवशता थी।
दिल्ली वाली बस में बैठ जाने केबाद मैंने सविता का चिंतातुर चेहरा देखा, तो सहसा उसकी सास का खयाल आ गया। उसकी सास ने एक बार भी बबलू की बीमारी को लेकर कोई सोच-फिकर नहीं जाहिर की थी। उधर बेचारी सविता को भाई की संगीन बीमारी से भी कहीं अधिक अपनी सास ननदों को शगुन देने की चिंता ने व्याकुल कर रखा था। क्या ससुराल के सारे नेग चुकाए बिना भी हमारी बेटियां अपने मरणासन्न पिता या भाई को देखने के लिए अपने मायकेकी ओर कदम बढ़ ही नहीं सकतीं?
एकाएक मेरी निगाह सविता के चेहरे पर गई। वह बहुत बेजार नजर आई। उसने सुबकते हुए कहा, ‘अंकल! बबलू भैया को क्या बीमारी हो गई, जो आपको यों भागना पड़।’
मैंने उसके सिर के पिछले भाग को हथेली से थपथपाते हुए कहा, ‘कुछ नहीं, बबलू तुझे देखकर ठीक हो जाएगा।’ और मैं बबलू की गिरती हालत और अस्पताल की अफरा-तफरी का खयाल करके आगे आने वाली स्थितियों को वहन करने का मन बनाने लगा।
इधर भाई अस्पताल में मौत से जूझ रहा है, और उधर बहन को इस बात की चिंता है कि मायके से उसे लेने आया व्यक्ति उसकी सास ननद को क्या नेग दे। सामाजिक दबाव क्या इतना गहरा होता है कि मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भीरुढ़ियों का बंधक बन कर रह जाता है?   
 
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