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धानीखेड़ गांव में आज सुबह से ही भारी रौनक है। नाली, खड़ंजे, रास्तों की सफाई, पानी का छिड़काव और हवा में लहराती रंग-बिरंगी झंडियां। सारा तामझाम देखकर लग रहा है जैसे कोई बारात आने वाली है। सरपंच ने वीरू को स्कूल के लड़कों को लाकर नारे लगवाने का काम सौंपा है। ‘अरे भाई नेताजी आ रहे हैं। हमारे ही गांव के रहने वाले हैं।’
वीरू को नेताजी से मिलने की बेचैनी थी। कब चार बजें और कब वह साथियों के साथ उहां पहुंचे। काका बिना किसी प्रयोजन के चार चक्कर कार्यक्रम-स्थल के लगा आए। ‘सब ठीक-ठाक है न रे। देख पानी का छिड़काव तनिक बढ़या से कर दे। हे, कुक्कुर एहर-ओहर डोल रहा है।’ उन्होंने उसे अपनी मोटी लाठी से मारकर खदेड़ दिया।
वीरू ने सफेद कुर्ता पायजामा कल ही धोकर डाल दिया था। रात में ही तह बनाकर सिरहाने रख लिया था। सुबह कई बार वहां से निकालकर देख चुका है, सब दुरुस्त है।
वीरू सोच रहा है- ये नेता लोग भी कितना बड़ आदमी होता है। आगे पीछे कितना लोग डोलते रहते हैं। जीप में चढ़कर खूब सैर-सपाटा, पीए-शीए, लग्गू-बज्झू, कितना लोग रहता है।’ यही सब सोचते हुए वीरू को नींद आ गई। आंखें खुली तो तीन बज चुके थे। झटपट उठकर हाथ-मुंह धोया। सिरहाने से कुर्ता-पायजामा निकालकर पहना। टुटहे आईने में चेहरा देखा। ‘बस एक टोपी की कसर है।’
तभी मित्र मंडली से आवाज आई, ‘वीरू चलो, जल्दी करो। हम लोगों को थोड़ पहले पहुंचना है।’ लंबे डग भरते हुए वीरू और साथी स्वागत-स्थल पर पहुंच गए। गर्मी का दिन, पसीना चुहचुहा रहा था। खड़-खड़ पैर पिराने लगा। अंगोछे से बार-बार पोछने के बावजूद पसीना थम नहीं रहा था। साढ़ तीन बजे, फिर चार। नेता जी आ ही रहे होंगे। मगर अब तो पांच भी बज गया, नेता जी का कहीं अता-पता नहीं। सरपंच दद्दा सब को आश्वस्त कर रहे थे- ‘आएंगे, नेता जी जरूर आएंगे। बड़ लोग हैं, बीस काम होते हैं। जरा तसल्ली रखो वीरू। तुम ज्यादा ही एहर-ओहर कर रहे हो।’
‘हम तो कुछ नहीं कर रहा हूं दद्दा।’
जीप की हरहराहट और हॉर्न से सबके कान खड़ हो गए।
‘आ गए, नेता जी आ गए।’ सबके सब भागे। सरपंच दद्दा ने माला पहनाई। वीरू और साथियों ने नारे लगाए। गला फाड़-फाड़ कर। नेता जी हवा में हाथ हिलाते हुए मंच पर आसीन हो गए। सरपंच जी ने नेता जी की तारीफ के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़। श्रोताओं के बीच बैठे कक्का जी उचककर कुछ कहना चाह रहे थे, लेकिन बगल में बैठे हरखू पहलवान ने कुरता खींचकर उन्हें चुप करा दिया, ‘चुप रहो कक्का नहीं तो उठाइ के अइसे लोकाइहों कि सीधे अपने दलान में गिरोगे।’ कक्का जी की घिग्घी बंध गई। भीगी बिल्ली की तरह चुपचाप बैठ गए।
चमचों के गुणगान के बाद अब नेताजी ने बोलना शुरू किया, ‘मैं इसी गांव की मिट्टी में जन्मा हूं। आज इस लायक हूं कि आपकी सेवा कर सकूं। आप हमें लोकसभा में भेजेंगे तो गांव की खुशहाली के लिए अपनी जान कुरबान कर देंगे। गांव में लड़कियों का कॉलेज, अस्पताल और डिगरी कॉलेज खुलवाऊंगा। यहां के किसी नौजवान को बेरोजगार नहीं रहने दूंगा।’
तालियां गड़गड़ उठीं। वीरू बड़ खुश था। सरपंच दद्दा ने उसका और उसके मित्रों का नेताजी से परिचय करवाया था। सब पूरी निष्ठा से नेताजी के प्रचार में लग गए।
नेताजी की जीत पर गांव में खूब खुशियां मनीं। सरपंच ने लड्डू बंटवाए। खुशी से फूला नहीं समा रहा था वीरू- नेताजी की जीत में अपना भी हाथ है। अब नेता जी हमारा भी ख्याल रखेंगे। सिर्फ कक्काजी नेताजी की जीत पर मुंह लटकाए बैठे थे। वीरू ने पूछ ही लिया, ‘कक्का सारा गांव खुशी माना रहा है मगर आप गुमसुम से काहे बैठे हैं।’
‘कुछ नाहीं बचवा।’
‘नाहीं कक्का जरूर कोई बात है। मेरी कसम सच-सच बताओ।’
‘तो सुनो वीरू। यह नेता ठीक आदमी नहीं है। बीस साल पहले जब तुम्हारा जन्म भी नहीं हुआ था, यह तब का लफंगा है। मारपीट धोखाधड़ में अव्वल। फिर एक दिन यह शहर चला गया। वहां की सरकारी पार्टी में शामिल हो गया। लफंगई और मारपीट तो कम कर दी लेकिन शराब और ऐय्याशी कम नहीं हुई। इसी ने मेरी बहन राधा की आबरू लूटी थी। इस बात को मेरे सिवा कोई नहीं जानता वीरू। उस घटना के बाद मेरी राधा ने कुएं में कूदकर जान दे दी थी। इसके साथ लड़कर भी मैं जीत नहीं सकता था।’ कहते हुए सुबक पड़ थे कक्का।
वीरू का खून खौल उठा। पर मजबूरी ने खून को ठंडा कर दिया। वह बीए कर चुका था। उसे नौकरी चाहिए थी। उसे नेताजी की मदद चाहिए। वीरू को उसका असली रूप पता चल चुका था, फिर भी उसने सरपंच दद्दा से राय ली। सरपंच ने कहा-
‘हां, वीरू , जरूर जाओ नेताजी के पास। यह उनका पता और फोन नंबर है। हमारा जिक्र कर देना, वे तुम्हारा काम जरूर करेंगे।’
‘अगर आप एक चिट्ठी दे देते तो..’
‘चिट्ठी की क्या जरूरत? इन्हीं कामों के लिए तो उन्हें चुना है। तुम बेफिकर हो कर जाओ।’
वीरू सुबह की बस से लखनऊ पहुंच गया। डायरी में फोन नंबर देखा। पीसीओ से फोन मिलाया। उधर से पूछा, ‘हलो ...कौन?’
‘नेताजी हैं?’
‘आप कौन हैं?’
‘धानीखेड़ से आया हूं। उनसे जरा मिलना था। आप बात करवा दीजिए।’
‘देखिए, नेताजी इस तरह फोन पर नहीं आएंगे। आप दस बजे दफ्तर आ जाइए।’
‘उनसे कहिए कि मैं उन्हीं के गांव से आया हूं। वीरू सिंह मेरा नाम है।’
‘अभी वह बाथरूम में हैं। कह दिया न आपसे।’ हारकर वीरू ने फोन रख दिया। किसी से सचिवालय का रास्ता पूछा और रिक्शा लेकर पहुंच गया। दस बजते ही गेटमैन से कहा, मुझे नेता जी से मिलना है।
‘जाइए गेट नंबर 9 से पर्ची बनवाइए।’ डरते-डरते वह गेट नंबर 9 पर पहुंचा।
‘हमें नेताजी से मिलना है।’
‘क्या नाम है?’
‘वीरू सिंह।’
‘फोन से यह नंबर मिलाइए।’
वीरू ने वही किया। ‘हलो.. कौन?’
‘जी मैं वीरू सिंह हूं। धानीखेड़ गांव से आया हूं। नेताजी से मिलने आया हूं। सुबह आपसे बात किया था। आपने दफ्तर आने को कहा था।’
‘अच्छा, वीरेंद्र सिंह बोल रहे हैं।’
‘जी।’ वीरू को कुछ आशा बंधी। लगता है नेताजी ने मुझे पहचान लिया है। वह उस कार्यक्रम को याद कर प्रफुल्लित हो उठा। किस तरह भागदौड़ कर गला फाड़कर प्रचार किया था। तभी उनके पीए ने जवाबी फोन किया, ‘अभी आपको रुकना पड़गा। नेताजी जरूरी मीटिंग में हैं।’
‘कब तक रुकूं सर?’
‘यह कैसे बता दूं भाई। जैसे ही मीटिंग खत्म होगी, आपको मिलवा देंगे। आप एक घंटा बाद फोन करिएगा।’
बरसात का उमस भरा दिन। सुबह से न नाश्ता न चाय। गेट नंबर 9 के बाहर ठेले पर चाय समोसा लिया। खाते हुए मन में विचार दौड़ने लगे, पता नहीं कब तक मीटिंग चलेगी। जैसे-तैसे एक घंटा काटा। गेट नंबर 9 पर पहुंच कर फोन मिलाया।
‘हलो, जी मैं वीरेंद्र सिंह। आपने कहा था एक घंटे बाद फोन करूं ।’
‘हां, कहा तो था, पर नेताजी दौरे पर चले गए। अब शाम तक लौटेंगे।’
वीरू को लगा, कक्काजी ठीक ही कह रहे थे। वह दुराचारी है। मगर क्या करूं, कहां जाऊं? आज रात को रुकना ही पड़गा। मगर इस शहर में कोई भी परिचित नहीं है। वीरू ने हिम्मत बांधी और नेताजी के घर की तरफ चल पड़। गेट पर दरबान ने रोक लिया, ‘कहां घुसे जा रहे हो?’ वीरू ने बताया, मैं नेताजी के ही गांव से आया हूं। उनसे मिलना है।
‘नेताजी तो अभी नहीं हैं। शाम तक आएंगे।’
‘मुझे अंदर तो आने दीजिए।’ वीरू ने कुछ कड़ई से कहा, ‘हमने उनके चुनाव में जी-जान एक कर दिया था। सरपंच ने भेजा है। सुबह से शाम हो गई उनसे मिलने की कोशिश करते हुए। इतना जुल्म तो मत करो...’
‘अरे, आप नाराज मत होइए। आइए, उधर टेंट में बैठ जाइए। जब नेताजी आएंगे तो हम आपको सबसे पहले मिलवा देंगे।’
वीरू को लगा इस जमाने में सीधेपन से काम नहीं चलता। इस छोटी सी जीत पर वह कुछ राहत महसूस कर रहा था। थकान और परेशानी से उसकी आंखें मुंद गईं। उठा तो एक कप चाय भी मिली। रात सात बजे नेताजी आए। बड़ सी गाड़ में लालबत्ती झिलमिला रही थी। वह कब उतरे, कब भीतर चले गए, पता ही नहीं चला। वीरू पीछे-पीछे दौड़। एक सिपाही ने उसे रोक दिया, ‘सांस तो लेने दीजिए उन्हें। मैं मिलवा दूंगा आपको।’
करीब साढ़ आठ बजे उसकी पर्ची अंदर गई। बीस मिनट बाद एक घंटी बजी।
‘चलिए साहब।’ वीरू का दिल धड़क उठा। तेजी से अंदर पहुंचा।
‘आप धानीखेड़ के वीरेंद्र सिंह हैं?’
‘जी।’
‘कैसे हैं आप। बैठिए। वहां सब ठीक है न। कैसे आना हुआ?’
‘एक पोस्ट है सर, सूचना कार्यालय में। अपर लिपिक के पद हेतु फॉर्म भरा है। आप कह दें तो मेरी नियुक्ति...।’
‘आप अपने डिटेल्स हमारे पीए को दे दो। देखते हैं। कुछ चाय-वाय?’
‘नहीं सर धन्यवाद।
‘अच्छा मुझे जरा बाहर जाना है। एक प्रोग्राम लगा हुआ है।’ वीरू को इशारा मिल चुका था। वह फौरन कुर्सी से उठ खड़ हुआ, जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। नेताजी ने अपने थुलथुल शरीर को सिंहासननुमा कुर्सी पर टिकाते हुए फिर घंटी बजाई। 
 
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