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वस्त्र लोगों की मूल जरूरतों में से एक है और फैशन का अनिवार्य हिस्सा भी। व्यक्तित्व में निखार लाने में परिधानों की भूमिका सबसे खास होती है। सर्दी, गरमी, बरसात, कोई भी मौसम हो या उत्सव, इंटरव्यू, खेल, पिकनिक आदि जैसी कोई भी परिस्थिति हो, उसके अनुरूप पोशाकें उपलब्ध होती हैं। ऐसे में परिधानों की वैरायटी का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। हालांकि फैशन के तहत फुटवियर, एक्सेसरीज, मेकअप, हेयर स्टाइल आदि तमाम बातें भी आती हैं, पर वास्तविकता तो यही है कि फैशन का नाम आते ही सबसे पहले ध्यान ड्रेस यानी पहनावे पर जाता है। अपनी जरूरत के कारण ही फैशन इंडस्ट्री दिन दुनी, रात चौगुनी तरक्की कर रही है। इस क्षेत्र में फैशन डिजाइनरों की भूमिका सबसे खास होती है, क्योंकि इसके बाद ही इस इंडस्ट्री में अन्य गतिविधियों की रूपरेखा तैयार होती है।
फैशन डिजाइनिंग
फैशन डिजाइनिंग के तहत क्रिएटिव लोगों के लिए न सिर्फ जॉब, बल्कि स्वरोजगार के रूप में भी मौके उपलब्ध हैं। फैब्रिक से लेकर लेदर डिजाइनिंग तक, किसी भी रूप में आप अपनी क्रिएटिविटी से कमाल कर सकते हैं...
कार्य का स्वरूप
ड्रेस डिजाइन किसके लिए करना है, इस पर विचार करने के बाद ही डिजाइनिंग की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। महिलाओं, पुरुषों, बच्चों या बुजुर्गों की जरूरत के अनुसार डिजाइन की स्केचिंग की जाती है। आज जमाना कंप्यूटर का है। ऐसे में स्केचिंग का 3डी पैटर्न भी बनाया जाता है। फिर उस पैटर्न के अनुसार गारमेंट की कटिंग को अंजाम दिया जाता है। इसके बाद सिलाई से लेकर पैकिंग तक के कार्य होते हैं। फिर बारी आती है मार्केटिंग, लॉजिस्टिक, होल सेल और रिटेलिंग की, ताकि उत्पाद ग्राहकों तक पहुंच जाएं।
डिजाइन सबके लिए
वैसे तो ड्रेस डिजाइनिंग के तहत महिलाओं के लिए प्रमुखता से काम किया जाता है, पर डिजाइनिंग का दायरा इतना सीमित नहीं है। पुरुषों के फैशन को ध्यान में रखते हुए भी काफी काम हो रहा है। इसके अलावा बच्चों की ड्रेस की वैरायटी तो देखते ही बनती है। फैशन डिजाइनिंग में उम्र संबंधी भी कोई बंदिश नहीं होती, यानी हर उम्र के लोगों को चाहिए, स्टाइलिश ड्रेस। ऐसे में कैरियर के मद्देनजर फैशन डिजाइनरों के लिए आज काफी अनुकूल माहौल है।
फैब्रिक से लेदर तक
सूती, रेशमी, खादी, सिल्क आदि वस्त्र निर्माण में इस्तेमाल किए जानेवाले फैब्रिक के अनेक प्रकार हैं, जिनमें रंगों की वैरायटी भी होती है। समय और जरूरत के अनुसार ही फैशन क्रिएटर इनकी मदद से पोशाकों का निर्माण करते हैं। फैब्रिक के अलावा लेदर का इस्तेमाल भी ड्रेस डिजाइनिंग के लिए किया जाता है। सर्द मौसम में ऐसे वस्त्रों की काफी मांग होती है। बारिश के मौसम में तो प्लास्टिक के भी परिधानों का ट्रेंड इन दिनों काफी बढ़ा है।
व्यक्तिगत गुण
क्रिएटिविटी तो रग-रग में बसी होनी चाहिए। संबंधित तकनीकी ज्ञान भी दुरुस्त रहना चाहिए। फैब्रिक की वैरायटी की बेहतर समझ जरूरी है। इसके अलावा रंगों का खास ज्ञान आवश्यक है। सबसे जरूरी है ट्रेंड पर नजर। तभी आप ग्राहकों की जरूरत के अनुसार पोशाकें बनाने में सफल हो पाएंगे।
कोर्स और शैक्षणिक योग्यता
फैशन डिजाइनिंग के तहत अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों के अलावा विभिन्न डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स भी उपलब्ध हैं। कोर्स की प्रकृति के अनुसार इनकी अवधि अलग-अलग हो सकती है। बीए ऑनर्स इन फैशन डिजाइन, बीए ऑनर्स इन टेक्सटाइल डिजाइन, बीए ऑनर्स इन फैशन मीडिया कम्युनिकेशन, पीजी इन फैशन डिजाइन, पीजी इन गारमेंट मैन्यूफैक्चरिंग, डिप्लोमा इन फैशन वुमन्स वियर आदि कोर्स फैशन डिजाइनिंग में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए कुछ महत्वपूर्ण कोर्स हैं। किसी भी संकाय में 12वीं के बाद ग्रेजुएशन और फिर पीजी कोर्सेज में दाखिला लिया जा सकता है। अधिकांश प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला एंट्रेंस टेस्ट और इंटरव्यू के आधार पर होता है।
मौके कहां-कहां
डिजाइनिंग हाउसेज, मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स, मर्केंडाइजिंग कंपनियों, एक्सपोर्ट हाउसेज, फैशन को-ऑर्डिनेटर यूनिट्स आदि में फैशन डिजाइनरों को मौके मिलते हैं। फैशन बायर्स के साथ भी जुड़ने का मौका मिलता है। लेखन या फोटोग्राफी का शौक हो तो फैशन जर्नलिस्ट या फैशन फोटोग्राफर के रूप में पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों में आप अवसर पा सकते हैं। फैशन और क्रिएटिव वर्ल्ड की समझ रखने वाले फैशन शो ऑर्गेनाइजर के यहां भी अवसर पाते हैं। डिजाइनिंग की वर्ल्ड क्लास प्रतिभा हो, तो फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में भी ऐसे प्रोफेशनल्स की जरूरत बनी रहती है। अध्यापन की इच्छा हो, तो उच्च स्तरीय शिक्षा पाकर टीचिंग में भी राहें बनाई जा सकती हैं।
स्वरोजगार के अनुकूल
बेहतर भविष्य के मद्देनजर फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना जहां जॉब के दृष्टिकोण से फायदेमंद होता है, वहीं इस क्षेत्र की अहमियत स्वरोजगार को लेकर भी है। कोर्स के बाद काम का कुछ अनुभव हासिल कर बुटीक, ड्रेस डिजाइनिंग सेंटर, अपेरल मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट के रूप में अपना काम भी शुरू किया जा सकता है। गौरतलब है कि बुटीक का काम जहां कम पूंजी से भी शुरू किया जा सकता है, वहीं अपेरल मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट के लिए अधिक पूंजी की जरूरत होती है। अपनी आर्थिक स्थिति के मद्देनजर रिटेलिंग का काम भी शुरू किया जा सकता है।
के मौसम में तो प्लास्टिक के भी परिधानों का ट्रेंड इन दिनों काफी बढ़ा है।
व्यक्तिगत गुण
क्रिएटिविटी तो रग-रग में बसी होनी चाहिए। संबंधित तकनीकी ज्ञान भी दुरुस्त रहना चाहिए। फैब्रिक की वैरायटी की बेहतर समझ जरूरी है। इसके अलावा रंगों का खास ज्ञान आवश्यक है। सबसे जरूरी है ट्रेंड पर नजर। तभी आप ग्राहकों की जरूरत के अनुसार पोशाकें बनाने में सफल हो पाएंगे।
कोर्स और शैक्षणिक योग्यता
फैशन डिजाइनिंग के तहत अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों के अलावा विभिन्न डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स भी उपलब्ध हैं। कोर्स की प्रकृति के अनुसार इनकी अवधि अलग-अलग हो सकती है। बीए ऑनर्स इन फैशन डिजाइन, बीए ऑनर्स इन टेक्सटाइल डिजाइन, बीए ऑनर्स इन फैशन मीडिया कम्युनिकेशन, पीजी इन फैशन डिजाइन, पीजी इन गारमेंट मैन्यूफैक्चरिंग, डिप्लोमा इन फैशन वुमन्स वियर आदि कोर्स फैशन डिजाइनिंग में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए कुछ महत्वपूर्ण कोर्स हैं। किसी भी संकाय में 12वीं के बाद ग्रेजुएशन और फिर पीजी कोर्सेज में दाखिला लिया जा सकता है। अधिकांश प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला एंट्रेंस टेस्ट और इंटरव्यू के आधार पर होता है।
मौके कहां-कहां
डिजाइनिंग हाउसेज, मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स, मर्केंडाइजिंग कंपनियों, एक्सपोर्ट हाउसेज, फैशन को-ऑर्डिनेटर यूनिट्स आदि में फैशन डिजाइनरों को मौके मिलते हैं। फैशन बायर्स के साथ भी जुड़ने का मौका मिलता है। लेखन या फोटोग्राफी का शौक हो तो फैशन जर्नलिस्ट या फैशन फोटोग्राफर के रूप में पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों में आप अवसर पा सकते हैं। फैशन और क्रिएटिव वर्ल्ड की समझ रखने वाले फैशन शो ऑर्गेनाइजर के यहां भी अवसर पाते हैं। डिजाइनिंग की वर्ल्ड क्लास प्रतिभा हो, तो फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में भी ऐसे प्रोफेशनल्स की जरूरत बनी रहती है। अध्यापन की इच्छा हो, तो उच्च स्तरीय शिक्षा पाकर टीचिंग में भी राहें बनाई जा सकती हैं।
स्वरोजगार के अनुकूल
बेहतर भविष्य के मद्देनजर फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना जहां जॉब के दृष्टिकोण से फायदेमंद होता है, वहीं इस क्षेत्र की अहमियत स्वरोजगार को लेकर भी है। कोर्स के बाद काम का कुछ अनुभव हासिल कर बुटीक, ड्रेस डिजाइनिंग सेंटर, अपेरल मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट के रूप में अपना काम भी शुरू किया जा सकता है। गौरतलब है कि बुटीक का काम जहां कम पूंजी से भी शुरू किया जा सकता है, वहीं अपेरल मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट के लिए अधिक पूंजी की जरूरत होती है। अपनी आर्थिक स्थिति के मद्देनजर रिटेलिंग का काम भी शुरू किया जा सकता है।
  • निफ्ट, नई दिल्ली और अन्य केंद्र
  • www.nift.ac.in
  • नेशनल स्कूल ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद
  • www.nid.edu/
  • पर्ल एकेडमी ऑफ फैशन, नोएडा
  • www.pearlacademy.com
  • जेडी इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी, जयपुर और अन्य केंद्र
  • www.jdinstitute.com
  • एनआईएफडी, चंडीगढ़
  • www.nifd.net
  • आईआईएफटी, नई दिल्ली
  • www.iiftindia.net
  • सत्यम फैशन इंस्टीट्यूट, नोएडा
  • www.satyamfashion.ac.in
  • एपीजे इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, नई दिल्ली
  • www.apeejay.edu/aid
  • विगन फैशन स्कूल, विभिन्न केंद्र
  • www.wlci.in
 
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