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कोटा। शहर के एक निजी अस्पताल का घिनोना चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। पैसों चार दिन के मासूम का इलाज रोक दिया। इतना ही नहीं प्रसूता के परिजनों द्वारा अस्पताल का खर्च समय पर नहीं भर पाने पर चिकित्सकों ने चार दिन के मासूम का इलाज रोक कर उसे डिस्चार्ज भी कर दिया।

कोटा के सुधा अस्पताल में एक प्रसूता के परिजनों द्वारा अस्पताल का खर्च समय पर नहीं भर पाने पर चिकित्सकों ने चार दिन के मासूम का इलाज रोक कर उसे डिस्चार्ज कर दिया। जबकि प्रसूता का नाम भामाशाह योजना में होने के कारण उसका अस्पताल में उपचार जारी रखा। परिजन मां को निजी अस्पताल में छोड़ कर नवजात को कोटा से 50 किमी का सफर तय कर रावतभाटा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे।

जहां बिना मां के मासूम को देखकर चिकित्सक भी हैरान रह गए। मासूम की स्थिति देखते हुए उसे कोटा मेडिकल कॉलेज रैफर किया। इसी तरह रावतभाटा से कोटा 50 किमी का चक्कर काट वापस कोटा आना पड़ा। इस तरह पिता अपने चार दिन के मासूम को लेकर 100 किमी तक दौड़ता रहा

बस्सी ग्राम पंचायत के दरीबा गांव निवासी घीसालाल ने बताया कि उसकी पत्नी नंदू बाई को 31 अक्टूबर सुबह 8 बजे प्रसव पीड़ा के साथ खून की उल्टी होने पर रावतभाटा के निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। जहां से उसे कोटा रैफर कर दिया। परिजन प्रसूता को कोटा के सुधा अस्पताल ले आए जहां इसी रात साढ़े 9 बजे प्रसव हुआ। मासूम और उसकी मां की स्थिति गंभीर होने के कारण दोनों को अलग-अलग आईसीयू में भर्ती किया गया।

बच्चे के पिता ने बताया कि उसकी उपचार के दौरान अस्पताल ने बच्चे की मां को भामाशाह योजना से जोड़कर उपचार शुरू कर दिया, लेकिन बच्चे के इलाज का चार दिन में 30 हजार रुपए का बिल दिया। सोमवार को बच्चे के इलाज के लिए 14 हजार रुपए की मांग की गई। रुपए का इंतजाम होने से पहले ही मां को अस्पताल में भर्ती रखकर चार दिन के नवजात को उसके पिता और उसकी बूढ़ी नानी के साथ दूसरे अस्पताल में उपचार करवाने की बात कह कर डिस्चार्ज कर दिया।

चार दिन का मासूम गंभीर बीमारी से ग्रसित होने पर चिकित्सक ने उन्हें कोटा मेडिकल कॉलेज रैफर किया गया। चिकित्सक मनोज श्रृंगी के अनुसार बच्चे की स्थिति ज्यादा गंभीर होने की वजह से कोटा रैफर करना जरूरी था। इलाज के दौरान मासूम की मां को भी दूध पिलाने के लिए साथ रखना आवश्यक है। मगर पैसे कमाने में अंधे व लालची हो चुके इस अस्पताल मैं मानवता की सारी हदें पार कर दी और पैसों के अभाव में मासूम बच्चे का इलाज करने से मना कर दिया गया।

उसी अस्पताल में हाल ही में अनाधिकृत रूप से बेसमेंट में चल रही कैंटीन को भी नगर निगम द्वारा सीज किया जा चुका है । वही बेसमेंट में जाने वाले रास्ते पर अवैध रूप से मेडिकल संचालित किया जा रहा है। उसकी भी जांच प्रशासन द्वारा की जा रही है। अब देखना यह है कि इस लापरवाह व अवैध वसूली का अड्डा बन चुके अस्पताल के खिलाफ जिला प्रशासन क्या सख्त कार्रवाई करता है ।

डिस्चार्ज की बात गलत
महिला व उसके पुत्र का इलाज आईसीयू में चल रहा था। बच्चे का इलाज शिशु रोग विशेषज्ञ महेन्द्र गुप्ता की निगरानी में हुआ था। परिजन स्वयं बच्चे को अन्यत्र इलाज कराने के लिए ले गए। डिस्चार्ज करने की बात गलत है।
डॉ. आरके अग्रवाल, निदेशक, सुधा अस्पताल कोटा



source https://lendennews.com/archives/61772

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